गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

सेहेतभी, स्वादभी........!

जब महाराष्ट्रमे खाना बनाना सीखा तो तरीका हर पकवानका अलग था....चाहे वो रोटी हो या चावल या दाल...!
हर सूबेवालोंका लगता है कि, उन्हींका तरीका सही और स्वादिष्ट होता है...!
मैंने पहली बार चावल मे नमक डाला तो शोर मच गया...एक दिन किसीने टोकके कहा, कि ये आटेमे नमक डालना बंद नही कर सकती? डालतीही क्यों हो..?
मेरे हाथकी बनी अरहर की दाल, मेरे नैहरमे सबको बोहोत अच्छी लगती थी...महाराष्ट्र मे रिवाजन, दालको पहलेही बघार के , फिर पकने चढाते हैं...उसमे लहसुन तथा प्याज़भी पड़ता है...मैंने लहसुन छीला , काटा, और जैसेही बघार लगाया..." हाय राम....उफ्फोह! इन मोह्तरेमाने तो दालमे लहसुन दाल दिया...सुना है कभी दलम लहसुन??नास पिट गया दालका....अब खायेगा कोई इसे.....? क्यों भाई तुम्हें दालभी बनानी नही आती...? लगता है महाराष्ट्र के लोगोंको खाना ना बनाना आता है न खाना, न परोसना..."

मेथीका साग, कढाई मेसे जब चम्मच उठाके उपरसे छोडो, तो कुरकुरा होके गिरना ज़रूरी....और ना जाने क्या, क्या...दिन बीतेते गए...
मै पंजाबी और उत्तर प्रदेश मे खाना बनानेके तरीक़े आत्मसात करती गयी...महसूस तो होता था कि, साग सबज़ीमेके सत्व तो ख़त्म होही जाते होंगे...पर जब सभीको उसी ढंग के खानेकी आदत थी तो मै क्या बदल सकती....? पूरी पराठे तो रोज़हीका चलन था...चाहे फल खाए जाएँ न जाएँ लेकिन, ४/६ किलो वनस्पती घी, दो किलो सरसोंका तेल.....जिसे तेज़ तेज़ गरम करके फिर उसमे नमक का पानी छिडका जाता.... तथा २ किलो देसी घी, ज़रूरी था...हर माह ....औसतन ४/५ लोगोंके लिए...संख्या बढ्तेही इसमे इज़ाफा होही जाता....!चार साल तो महाराष्ट्र्के बाहरही गुज़रे....

फिर मुम्बई तबादला हुआ...अब जब यहाँके लोग खानेपे बुलाते तो, मुझे बड़ा संकोच होता कि, अब ना जाने क्या टीका टिप्पणी होगी...!कई घरोंमे रोटीके चार टुकड़े करकेही परोसे जाते हैं...दिल्लीवालोंका लगता कि, येभी क्या पारोसनेका ढंग हुआ...कुत्तेको टुकड़े दिए जाते हैं..!

ये सब मै ढंगसे पेश कर रही हूँ.....उन दिनों तो तनावग्रस्त हो जाती थी, लेकिन फिर तो आदत पड़ गयी....

कुछ साल और बीत गए...और फिर, "लक्कड़ हज़म पत्थर हज़म" कहनेवालों को डायबिटीज़ ने घेरा....किसीको बेहद हाय कोलेस्ट्रोल निकला...किसीको दिलकी बीमारी शुरू हो गयी...बीपी भी बढ़ने लगा...सासू-माँकी तो रेटिनल detatch मेंट के कारण आँखोंकी रौशनी चली गयी..रेटिना जले काज़गकी तरह हो गया था...डॉक्टर ने वजह बताई, खूनमे शक्करकी अत्याधिक मात्रा होना...सदमा तो हम सभीको लगना थाही..
एक बार मेरा किसी कारन CT स्कैन करवाना था... पतिदेव, मेरे साथ अस्पताल आए ...शौक़िया उन्होंनेभी अपना खून टेस्ट करने दे दिया....!
जब रिपोर्ट्स मिले तो मेरा तो सबकुछ नॉर्मल था....ससुरजी और बादमे अन्य कई लोगों ने पूछा," क्यों, कुछ निकला?"
मैंने कह दिया," जी नही ॥!"
" कुछ नही निकला...? सरदर्द की कोई वज़ह...?
"नही...ऊपरकी मंजिल बिल्कुल खाली है...कुछ नही है वहाँ...!"अब मैंने हँसते येही जवाब देना शुरू कर दिया था...

खैर मुद्देकी बातपे आती हूँ.....मेरे साजनको बताया गया कि, उनके कोलेस्ट्रोल की मात्रा आसमान छू रही थी...! खूनमे चीनी की मात्रा भी ज़रूरतसे ज्यादही थी....औरभी ना जाने क्या, क्या...
अबतक मैंने खुदकी खान पान की आदतें तो काफ़ी बदल दी थीं...मेथीका साग तो छौंकतेही अपने लिए निकाल लेती...ख़ुद कमानेभी लग गयी थी...महाराष्ट्र मे नैहरसेभी हमेशा फल आते रहते...एक बात और मैंने गौर की...गर किसीको ख़ास," ये आपने लेना चाहिए...सेहेतके लिए अच्छा रहेगा..",इतना भर कह दो तो, बतक़ की पीठपे पानी...!
जैसे छोटे बच्चों के साथ तरीका अपनाया जाता है, मैंने वैसाही शुरू किया...इससे बच्चे और बड़े दोनोकोही फायदा हुआ...!

मै सलाद काटके खानेसे पहले मेज़पे रख देती...इसमे अक्सर, टमाटर, खीरा, गाजर, इनके अलावा पत्ता गोभी भी ज़रूर रख देती...कुछ देर बर्फपे रखी हुई...हल्का-सा नीबू...काला नमक...खानेमे कुरकुरी....
मासिकों मे या अखबारों मे आए दिन खानपानके बारेमे लेख आयाही करते.. ऐसे लेख का वो ख़ास पन्ना मै इसतरह लापरवाही जताते हुए रखती,कि उसपे मेरे सजनाकी नज़र पड़्ही जाती.....
कई बार मै जानके अपनी बेहेन या किसी सहेलीको चुपकेसे आगाह कर देती कि, जब मै फोन करूँ, तो कुछ ऐसे सवाल पूछे, जिनके जवाब मै अपने पती या सासु-माँ के पास खडी रह दे दिया करूँ...
" अरे! तेरे बाबूजीको भी ये शिकायत हो गयी है?......ओहो..... जानती है, मैंने पढा...और वैसे हमारे डॉक्टर नेभी बताया कि, कच्ची पत्ता गोभी बड़ी फायदेमंद होती है... खानेसे पहले खाओ तो और अधिक..और हाँ! तूने कभी एकदम ताज़ी मेथीको अच्छेसे धोके, बस परोसनेके पहले काटके , उपरसे छौंक लगाया है कभी? अरे..कभी खाके तो देख...साथ थोड़ी-सी मूँग फली की चटनी...और छौंक गायके घीमे लगना...तपाया तेल तो बड़ा हानीकारक होता है....तू कच्ची घनीका ही तेल इस्तेमाल करती हैना....हाँ! बिल्कुल सही...refined oil तो सब गुण खो देता है....."

कुछ ही दिनों बाद मै देखती, मेरे पतिदेव पत्ता गोभीकी एक प्लेट समाप्त करने लग गए.......!
चलिए...ये तो सिर्फ़ शुरुआत है "लिज्ज़त" की...मैंने भी शुरू कर दिया था...सीखा हुआ परे ताके अपने मनसे प्रयोग करना...एक उम्रके बाद स्वाद बदलना मुश्किल होता है..लेकिन उसी स्वाद्के क़रीब्का स्वाद,हो पर हानीकारक ना हो तो , इससे अधिक अच्छा क्या हो सकता है?
जीवनमे यही सीखती रही...पाक कलाभी है..शास्त्रभी...शास्त्र को कलामे बदलना होता है...कलाको शास्त्रमे.......सुघड़ गृहिणी इसमे कामयाब हो जाय तो परिवारका स्वास्थ्य बिगड़नेसे बच सकता है...बस सही समयपे जागरूक होना चाहिए...सांपभी मरे और लाठीभी ना टूटे...!

अगली बार, इतना लंबा प्रस्ताविक ना देके सीधे कुछ टिप्स पे आ जाऊँगी...टिप्स्भी कैसे सूझे, इसकी ज़रा-सी पार्श्वभूमी तो ज़रूर बता दूँगी...वरना ज़ायकेदार लेखन तो होगाही नही, हैना? कुछ चटपटी बातें साथमे हो तो मज़ा औरही होता है...!

2 टिप्‍पणियां:

  1. bhumika sun hee munh me panee bhee aa gaya aur svasthya kee gaurantee bhaa gaya . ab kuch pakane khilane ka bhee intezam ho jaye !
    main bhee pakane ke chakkar me hoon aur aapkee baton kee rasbharee aur chatpatee 'chaunk' ka bhee muntazir .
    kab parosengee ? bhookh lag aayee hai !

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  2. hmm..poora padha aur kayi cheezen aise lagi jaise mere ghar me bhi to yehi hota tha....healthy food is a way of life now.waiting for more from you.
    please visit my healthfood blog if time permits you.

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